“भाषा समझ एवं सम्प्रेषण का माध्यम है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
प्रश्न – “भाषा समझ एवं सम्प्रेषण का माध्यम है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर- हम अक्सर बातचीत के क्रम में कई प्रतीकों का उपयोग करते हैं। जैसे लिखी हुई प्रतियों के बाइन्डिंग को किताब, लिखने की सामग्री को कलम आदि नामों से पुकारते हैं। इस प्रकार हम बातचीत में अनेक प्रतीकों को वाचिक रूप से अभिव्यक्त करके सुनने वालों की इसकी अभिव्यक्ति कराते हैं।
भाषा की उत्पत्ति मनमाने ढंग से हुई है, जिसे यादृच्छिकता कहा जाता है। भाषा को समझने तथा इसके विकास की सही दिशा में बढ़ने के लिए इस मनमानेपन को समझना आवश्यक होता है। हमारे सामने जब कोई अनजान वस्तु, भाव, स्थान, व्यक्ति आदि आते हैं, तो उनके बारे में दूसरों को समझाने के लिए हम प्रतीकों (पहाड़, नदी, पेड़ आदि) का उपयोग करते हैं। हम उनको कोई नाम देना चाहते हैं। इसी नाम के माध्यम से हम उसके बारे में दूसरों को बता पाते हैं। नाम देने का काम भाषा के द्वारा लिया जाने वाले बुनियादी काम है।
देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने अपने द्वारा संपादित पुस्तक ‘जानने की बातों में कहा है कि अपनी बातों को दूसरे तक पहुँचाने के साधन के रूप में ध्वनि प्रतीक अन्य माध्यमों की तुलना में अधिक कारगर है। जैसे—मान लीजिए हमने पहाड़ के लिए एक पत्थर का टुकड़ा, नदी के लिए धागा, पेड़ के लिए कोई तिनका और इसी तरह और भी मान लेते हैं और इसे अपने झोले में रखकर घर से निकल पड़ते हैं। रास्ते में एक व्यक्ति को पेड़ के बारे में बताना चाहते हैं। इसके लिए झोले से तिनका निकालने की कोशिश करते हैं, लेकिन तिनका नहीं मिल रहा है। काफी समय तक कोशिश करने के बाद तिनका मिलता है, लेकिन तबतक वह व्यक्ति जा चुका होता है ।
इससे स्पष्ट है कि इसके जगह पर हम ध्वनि प्रतीकों का सहारा लेते तो आसानी से उस व्यक्ति को समझा सकते और समय भी कम लगता। अमेरिकी एडवर्ड स्पीयर (1961) भाषाविद् ने भाषा को संप्रेषण का साधन मानने के विचार का वैकल्पिक विचार प्रस्तुत किया है। उनका विचार है कि —”यह स्वीकार कर लेना सबसे उचित होगा कि प्राथमिक रूप से भाषा वास्तविकताओं को प्रतीकों के रूप में देखने की प्रवृत्ति की वाचिक प्रस्तुती है। वाचिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुति का अर्थ है, अनुभव को जाने पहचाने रूप में ढालकर, न कि प्रत्यक्ष रूप से सामना करके, वास्तविकता पर नियंत्रण स्थापित करने की प्रकृति। “
भाषा का सबसे प्राथमिक कार्य वास्तविकता को प्रतीकों में ढालना है। प्रतीकों का निर्माण मानव मन की उपज है। वह लगातार नये प्रतीकों को गढ़ता रहता है| लेंगर ने इंसान को तेजी से गढ़ने वाले की संज्ञा दी है। उनका मानना है कि इंसान मस्तिष्क प्रतीकों की अविरल धारा से निर्मित होता है।
इस प्रकार हमने देखा कि भाषा प्रतीकों की वाचिक व्यवस्था है। इसके जरिए हम संसार को समझने के लिए वाचिक प्रतीक गढ़ते हैं। इन प्रतीकों से इंसान को वह सहारा मिलता है, जिसके माध्यम से वह ठोस चीजों से स्वतंत्र होकर उन पर विचार तथा बात कर सकते हैं। भाषा सम्प्रेषण के माध्यम से पहले प्रतीक गढ़ने का माध्यम है। इन प्रतीकों के जरिए विचार व्यक्त करते हुए हमारी समझ बनती है । इस प्रकार भाषा सम्प्रेषण का माध्यम होने के पहले समझ का माध्यम यानी दोनों हैं।
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